पूर्व केंद्रीय मंत्री राम किंकर की मनाई गई सौवीं जयंती


प्रतापगढ़ 2 जनवरी 2022
प्रतापगढ़ मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर पट्टी तहसील के सराय रजई गांव में आज स्वर्गीय रामकिंकर पूर्व केंद्रीय मंत्री भारत सरकार के सौवेंजन्म दिवस के अवसर पर समारोह का आयोजन किया गया समारोह में सबसे पहले उपस्थित अतिथियों वक्ताओं एवं आगंतुकों ने स्वर्गीय रामकिंकर एवं उनकी पत्नी स्वर्गीय विमला देवी की समाधि पर उनके चित्र पर माल्यार्पण किया व पुष्पांजलि अर्पित की गई ।

जयंती कार्यक्रम में शामिल लोग

कार्यक्रम के आरंभ में अशोक किंकर ने अतिथियों का स्वागत किया समारोह की अध्यक्षता मास्टर हाजी रुकनुद्दीन ने किया समारोह में हाजी रुकनुद्दीन ने सर्वप्रथम रामकिंकर जी के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला हेमंत नंदन ओझा कार्यक्रम संयोजक में रामकिंकर जी का जीवन परिचय दिया इस अवसर पर पूर्व विधायक नागेंद्र सिंह मुन्ना जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष डॉक्टर लाल जी त्रिपाठी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला मंत्री रामबरन सिंह जिला पंचायत सदस्य पूनम इंसान पुरातत्वविद डॉक्टर पीयूष कांत शर्मा पूर्व बैंक प्रबंधक बीपी त्रिपाठी डीपी इंसान पूर्व प्रमुख रामप्रकाश सरोज पूर्व प्रमुख शांति सिंह जगदीश प्रसाद मिश्र पूर्व प्राचार्यडॉ वीके सिंह डॉक्टर नीरज त्रिपाठी मजदूर नेता राम सूरत एडवोकेट सलीम उद्दीन खान शहर कमेटी कांग्रेश के अध्यक्ष इरफान अली आई पी तिवारी निर्भय प्रताप सिंह मुख्तार खान आदि ने समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि स्वर्गीय रामकिंकर जी सन 1952 से पांच बार विधायक हुए उत्तर प्रदेश सरकार में उप मंत्री एवं कैबिनेट मंत्री हुए बाराबंकी से दो बार सांसद हुए राज्य मंत्री एवं कैबिनेट मंत्री हुए पांच पांच विभागों के कैबिनेट मंत्री थे लेकिन उन्होंने अपने जीवन को अत्यंत ही सादगी ईमानदारी के साथ जिया उन्होंने व्यक्तिगत संपदा अर्जित करने से अपने आप को काफी दूर रखा उनकी ईमानदारी और निष्ठा के नाम पर शपथ ली जा सकती है उन्होंने ऐसी इमानदारी के साथ अपने जीवन को जिया वह हमेशा समाज के लिए प्रेरणा के स्रोत रहेंगे उन्होंने व्यक्तिगत जीवन में परिश्रम से मुंह नहीं मोड़ा खुद दैनिक रूप से रोज अपनी खेती में परिश्रम करते थे हजारों लोगों को उन्होंने नौकरी दिलाई सड़के बनवाई लेकिन जिसकी भी मदद की उससे कोई अपेक्षा नहीं किया वह वास्तव में समाजवादी गांधीवादी सिद्धांतों के पक्के सिपाही थे वक्ताओं ने कहा कि आज के समय में ऐसे व्यक्तित्व के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए ताकि नौजवान उससे प्रभावित हो सके। समारोह में रामकिंकर जी की पुत्री सौम्या किंकर ने अपना ओजस्वी और आकर्षक वक्तव्य दिया। इस अवसर पर रामकिंकर न्यास में स्वर्गीय रामकिंकर के परिवार की ओर से ₹251000 की धनराशि रामकिंकर स्मृति न्यास में देने की घोषणा की गई और कहा गया कि इससे लड़कियों की शिक्षा के लिए कार्य किया जाएगा समारोह में यह भी घोषणा की गई कि वर्ष भर अनेक कार्यक्रमों का आयोजन होगा 2 जनवरी 2023 को जन्मशताब्दी समारोह का समापन भी सराय रजई मैं भव्य स्वरूप में किया जाएगा। कार्यक्रम में सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण महिलाएं पुरुष उपस्थित उपस्थित रहने वालों में प्रमुख रूप से पारसनाथ यादव आर डी यादव हर्षवर्धन शुक्ला संतोष किनकर संत प्रसाद जयप्रकाश जगत नारायण लालता प्रसाद हरिप्रसाद पारसनाथ दीपू विजय सच्चिदानंद आरके सिंह प्रधान ग्राम सराय रजाई व अन्य सैकड़ों लोग उपस्थित रहे । धन्यवाद ज्ञापन जगदीश प्रसाद मिश्र एवं हेमंत नंदन ओझा ने किया ।

पासी राजा थें बैस राजपूतों के पुरखें – लेखक केपी बहादुर सिंह

पासी राजवंश से सरोकार है तो एकबार इस लेख को जरूर पढ़ना । वैसे मेरी पोस्ट सार्वजनिक होती है कोई भी पढ़ सकता । हम मानते हैं कि इतना साहित्यिक और इतिहासिक झोल मचा दिया गया है कि मेरी बात को मानना और नकारना दोनों ही आसान नहीं ।खैर पढ़ें और समिक्षा अध्ययन विचार करें ।

पासी राजाओं पर तमाम जातियां करती हैं दावेदारी ।

प्रजापालक राम, नरपति चन्द्रविक्रम विक्रमादित्य पासी, परशुराम,वीरसेन, महाराजा हर्ष वर्धन, महाराजा सुहेलदेव पासी , महाराजा डालदेव ,राजा हिरसिंग बिरसिंग ,अमर सहीद वीरांगना ऊदादेवी पासी आदि तमाम राजा महाराजा और क्रांतिकारियों को लेकर अक्सर ब्राम्हण समाज , ठाकुर (राजपूत), अर्कवंशी, राजभर,यादव समाज, गड़ेरिया समाज,लोधा समाज की कुछ जातियां पासी समाज के महापुरुषों के ऊपर अपना दावा ठोकती रहती हैं । इसके पीछे कुछ तो कारण है। कारण साफ है उपरोक्त समाजों की इन जातियों के पुर्वज पासी ही हैं। लेकिन आधिपत्य सत्ता में अधीनस्थ सत्ता के लालच में कुछ लोगों ने गुप्तकाल (364 ई से 606ई) में पाला बदला और 1325ई से 1857 के बीच कुछ लालची गद्दार पासी परिवारों ने पाला बदला फिर 1871 से 1935ई के बीच काफी पासी परिवारों ने समाज से गद्दारी करते हुए पाला बदला फिर मंडल कमीशन नब्बे के दशक में स्वयंमेव कुछ लोग बदल गये । अब उनकी संतति पासी नहीं है यह हम जानते हैं । जिन समाजों में यह गद्दार पासी समाहित हुए हैं अभी आज तक उन समाजों की पुरानी जातियों में इनके सादी विवाह संबंध भी नहीं होते ।यह लोग उन समाजों में अपनी पक्की दावेदारी के लिए अपने जन्मदाता पासी समाज की जातियों तथा दलित (कर्मकार) जातियों पर जुल्म भी करते हैं। इतिमिनान से यकीन के लिए सामाजिक वातावरण का अध्ययन कर सकते हैं। और साक्ष्य के रूप में स्लीमेन डायरी का अध्ययन भी कर सकते हैं। नये सबूतों में 1911 से लेकर 1931 तक की जातीय जनगणना का अवलोकन भी कर सकते हैं ।आज भी तमाम पासी पासी धर्म भूलकर स्वयं को अन्यत्र गिनाने जोड़ने के चक्कर में रहते। मैं कमला रावत आज के बचे पासियों से निवेदन करती हूं कि जब आपके पुरखे तमाम कठिनाइयों को झेलकर भी पासी धर्म परिवार को नहीं छोड़ा तो आप अपने पुरखों की लाज रखना पासी बनकर पासी धर्म का पालन करना।

कुछ साक्ष्य कड़ियां इस प्रकार हैं।
आदरणीय मित्रों भारत मे सन् 1871 से लेकर 1931 तक छे बार जातीय जनगणना हुई जिसमे पाया गया कि तथाकथित हिन्दू धर्म के चौथे पायादान से ऊपर के तीनो पायदान की ओर उर्धगमन किया । यह स्थति 1944 तक गांधी जी के ऊँचा बनो अभियान और आर्य समाज के सुधार आन्दोलन तथा जरायम एक्ट से मूक्ति पाने के कारण हुआ ।


1901 से 1911 के मध्य जनगणना में 57 जातियों ने उर्धगामी छलांग लगाई ।फिर 1921 की जनगणना मे 83 जातियों ने उर्धगामी छलांग लगाई ।1931 की जनगणन मे 148 जातियों ने छलांग लगाते हुए अपनी जातियों को ब्राह्मण ,क्षत्री ,वैष्य जातियों मे समाहित कर दिया । इनमे 37 जातियां ब्राह्मण बन गयीं ,80 जातियां क्षत्रिय बन गयीं ,15 जातियां वैष्य बन गयीं और शेष जातिया चन्द्रवंशी क्षत्रिय कहलाने लगीं ।


आजादी के बाद हालत कुछ और है । संविधान मे बाबा साहब ने कुछ जातियों को आरक्षण दिया । बापू मसुरियादीन पासी के प्रयासों से जरायम एक्ट की जातियों को 31 अगस्त 1952 मे आजादी दिलाने के बाद 1957 मे इन जातियों को तीनो प्रकार की आरक्षण सूची में शामिल कराया । इसके बाद 90 के दसक मे मंण्डल कमीशन के आधार पर पिछडा वर्ग आरक्षण नौकरियो मे और त्रिस्तरीय पंचायत चुनाओं मे लागू हुआ ।


इसके बाद वह उर्धगमनकारी जातियां अधोगमन के लिए छतपटा रहीं हैं । कुछ पिछडा वर्ग तो कुछ अनुसूचित जाति जनजाति मे अधोगमन वापसी के लिए मांग और धरना प्रदर्शन तक कर रही हैं लेकिन वह अपने उर्धगामी टाइटिल को त्यागना नही चाहती । कुछ तो अधोगमन वाला जोखिम नही उठाना चाहती वह आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग करती हैं । उर्धगमन में पासीवंश की भी बहुत जातियां है । सात आदिवासी जातियां भी हैं ।
इन उर्धगामी जातियों में तीनो वर्णो की जातियों में शादियां भी उर्धगामी होती है । अर्थात उक्त तीनो वर्णो के पूराने लोग यह उर्धगामी स्थिति जानतें हैं इसलिए इनकी लडकियों की शादी अपने लडको से तो कर लेते हैं परन्तु अपनी लडकियां इनके घरों मे नही ब्याहते । उर्धगमन की जानकारी वर्ष 1931 की जनगणना रिर्पोट के पृष्ठ 430 से 441 तथा 528 से 532 और 345 से 352 पृष्ठों के अध्ययन मे सब कुछ साफ नजर आएगा ।


विडम्बना देखिए ब्रिटिस शासन काल मे सभी चाहते कि उनकी जाति को उच्चता की श्रेणी मे रखा जाय लेकिन आधुनिक युग मे अनुसूचित जाति जनजाति आयोग और मंडल आयोग को सैकडो आवेदन तथा धरना प्रदर्शन मांग तीनों वर्णों की जातियों की तरफ से किये जातें हैं ।
लेकिन भारत की वर्ण परक ऊँच्यता नीचता के कलंक के कारण यह लोग उर्धगमन वाले तथ्यों को उजागर नहीं करना चाहते हैं ।सब समय काल की बात हैं । इसीलिए कई जगह पासी राजाओं और उनके किलों को लेकर तमाम लोग दावा करते हैं ।


साभार :
कमला रावत
9919505615

बिहार के गाँधी जगलाल चौधरी की मनाई गई जयंती

रोहतास / दिनाँक 16 फरवरी 2021 दिन मंगलवार को रोहतास जिला के दिनारा प्रखण्ड मुख्यालय स्थित बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर स्मारक के प्रांगण मे स्वतंत्रता सेनानी एव बिहार सरकार के प्रथम दलित कैबिनेट मंत्री पासी समाज मे जन्मे माननीय जगलाल चौधरी जी की 126वीं जयंती समारोह बड़े ही धूमधाम से आयोजित की गयी .

जगलाल चौधरी जयंती समारोह के इस कार्यक्रम मे दिनारा प्रखंड और निकटवर्त्ती प्रखंड के सभी पंचायतों से सामजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता शामिल हुए । जगलाल चौधरी जयंती समारोह के इस कार्यक्रम की शुरुआत बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा पर और जगलाल चौधरी के चित्र पर माल्यार्पण करके की गयी .

इसके बाद समारोह मे शामिल सभी लोगों ने बारी बारी से बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर और जगलाल चौधरी के चित्र पर पुष्पांजलि की, जगलाल चौधरी जयंती समारोह के इस कार्यक्रम की अध्यक्षता भाकपा माले के वरिष्ठ नेता गोपाल राम ने तथा मंच संचालन अमित कुमार ने किया। जयंती समारोह मे शामिल लोगों ने बारी बारी से अपने संबोधन के माध्यम से जगलाल चौधरी के जीवनी और स्वतन्त्रता संग्राम और समाज सुधार मे जगलाल चौधरी के योगदान पर प्रकाश डाला.

मंच संचालन कर रहे अमित कुमार ने जगलाल चौधरी के जीवनी का संक्षिप्त परिचय देतें हुए कहा कि जगलाल चौधरी सामाजिक न्याय के अग्रदूत थें उन्होंने समाज के कमजोर वर्ग की भलाई के लिए आजीवन संघर्ष किया। जयंती समारोह के इस मौके पर गोपाल राम, शिक्षक सुरेंद्र राम,उमाशंकर राम,श्यामलाल पासवान,अधिवक्ता विजय कुमार आजाद, पूर्व पुलिस इंस्पेक्टर दादा सुदर्शन बौद्ध, साजिद हुसैन,डॉ मुन्ना सिंह,राजेश राम,दिनेश माहेश्वरी,जयचंद पासवान मुन्ना ठाकुर ,डॉ संतोष,कालीचरण राम,कमलेश भारती,सुधीर कुमार,गौतम कुमार, मदन कुमार,लक्ष्मण कुमार, श्रीनिवास पासवान, श्रवण पासवान, त्रिभुवन पासवान सहित सैकड़ों लोग मौजूद थे

क्यों भाजपा को शूट करता है ओवैसी की डर्टी पॉलिटिक्स ?

ओवैसी क्या है? अगर समझना चाहते हैं तो आपको शकील अख्तर का लिखा ये लेख पढ़ना चाहिए

औवेसी ने अपने चेहरे से सियासत की नकाब उतार दी है। धार्मिक नेताओं से दो कदम आगे जाकर वे मजहबी मामले में खुल कर बोलने लगे हैं। अभी बोला तो उन्होंने कर्नाटक में है मगर उसका असर उत्तर प्रदेश में हो रहा है। औवेसी ने अयोध्या में बन रही मस्जिद को अस्वीकार्य कर दिया। इसे हराम करार दे दिया। औवेसी के इस बयान ने यूं तो देश भर में हलचल मचा दी मगर यूपी जहां एक बार फिर मुस्लिम-जाट समीकरण बनता नजर आ रहा हैं वहां मुसलमानों के बीच एक अनावश्यक बहस पैदा कर दी। मुस्लिम धर्म के अधिकांश विद्वानों ने औवेसी के इस बयान की निंदा की है। इसे गलत बताया है। कहा कि वे अपनी राजनीतिकरें। मजहब के मामले में टांग न अड़ाएं।

मंदिर-मस्जिद विवाद में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार मुसलमानों ने अयोध्या में नई जगह पर 26 जनवरी गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रीय ध्वज फहराते हुए मस्जिद की नींव रखी। किसी भी विवाद से बचने के लिए मस्जिद का नाम उस गांव धन्नीपुरा पर रखने का भी फैसला किया, जहां इस मस्जिद के लिए जगह मिली है। मस्जिद के साथ वहां 200 बेड का हास्पिटल, एक बड़ा कम्युनिटी किचन जहां से गरीब, निराश्रित लोगों को खाना मिले के साथ अन्य सामाजिक सेवा के काम भी करने के फैसले लिए। सारा काम एक ट्रस्ट बनाकर पारदर्शी तरीके से सबको साथ लेकर करने की शुरुआत हुई। मगर औवेसी ने मस्जिद पर ही सवाल उठाकर इन सारी सद्भाव और भाइचारे की कोशिशों को विवाद में घसीटने का अक्षम्य अपराध किया है।

सिर्फ अयोध्या, यूपी ही नहीं पूरे देश के मुसलमान इस विवाद को हमेशा के लिए खत्म करना चाहते है। अदालत के फैसले के बाद से उन्होंने संयम और समझदारी बना कर रखी। राम मंदिर के लिए चंदा इकट्ठा करने के लिए मध्य प्रदेश में कुछ जगह लोग मस्जिदों के अंदर पहुंचे। मस्जिदों की मिनार पर चढ़ गए तब स्थानीय मुसलमानों ने संयम बनाए रखा। साथ ही मध्य प्रदेश सहित देश भर के तमाम हिस्सों से राम मंदिर निर्णाण के लिए अपनी तरफ से सहयोग राशि भी दी। सबका उद्देश्य एक ही था कि सद्भाव बना रहे और मंदिर- मस्जिद विवाद खत्म हो ताकि देश प्रगति के पथ पर वापस आगे बढ़ सके। लेकिन ऐसे में औवेसी ने एक उस बहस को छेड़ा है जिसे भूल कर मुसलमान आगे बढ़ना चाहते हैं।

औवेसी का उद्देश्य क्या है यह अब किसी से छुपा नहीं है। वे धर्म के आधार पर भावनाओं का खेल खेलने की तरफ बढ़ रहे हैं। इसके नतीजे मुसलमानों के लिए क्या होंगे यह शायद वे सोचने को तैयार नहीं हैं। हैदराबाद में उन्होंने स्थानीय निकायों के चुनाव में भाजपा को मजबूत करके जो राजनीति शुरू की है उसका बड़ा रूप अब बंगाल में दिखाई देने वाला है। भाजपा को औवेसी और औवेसी को भाजपा पूरी तरह सूट कर रहे हैं। दोनों धर्म का इस्तेमाल करके उन राजनीतिक दलों को किनारे करना चाहते हैं जिनका धर्मनिरपेक्ष स्वरूप है। बंगाल में भाजपा बहुत छोटी और नई पार्टी है और असदुद्दीन औवेसी की पार्टी एआईएमआईएम का वहां कोई अस्तित्व ही नहीं है।

ये ठीक वैसी ही स्थिति है जैसी हैदराबाद में थी। वहां औवेसी का थोड़ा असर था और भाजपा कहीं नहीं थी। मगर नगर निगम के चुनावों में क्या हुआ? दोनों की नूरा कुश्ती ने हैदराबाद में भाजपा को बड़ी ताकत बना दिया। वह चार सीट से सीधे 48 पर पहुंच गई। औवेसी जिनका हैदराबाद गढ़ है भाजपा से पीछे रही। उसे 44 सीटें मिलीं। लेकिन औवेसी को इसका गम नहीं है। यहां भाजपा ने उन्हें चैलेंज किया था तो वह आगे बढ़ी बिहार में औवेसी ने भाजपा को चुनौति देकर हासिल तो पांच सीट की मगर महागठबंधन को कई सीटों पर पीछे धकेल कर भाजपा, नीतीश की सरकार फिर से बनवा दी। अब दोनों को एक दूसरे की मदद से आगे बढ़ने की राजनीति रास आने लगी है। दक्षिण में कर्नाटक के अलावा भाजपा कहीं नहीं थी। मगर औवेसी ने उसे हैदराबाद में नंबर दो की पार्टी बना दिया। स्थानीय टीआरएस से थोड़ी ही कम।

भाजपा को समझ में आ गया है कि दक्षिण में और दक्षिण में क्या पूरे भारत में औवेसी से लड़ती हुई दिखकर वह ऐसी कामयाबी हासिल कर सकती है जो इससे पहले उसे कभी नहीं मिली थी। पांच राज्यों के इसी साल होने वाले चुनावों में औवेसी हर जगह जाएंगे। और इसका फायदा किसको होगा यह बताने की जरूरत नहीं है। औवेसी की राजनीति दो तरह से काम करती है। एक वे धर्मनिरपेक्ष दलों के वोट काटते हैं और दूसरे धार्मिक आधार पर भाजपा के वोटों के ध्रुविकरण को और मजबूत करते हैं।

इस काम को और तेज गति देने के लिए ही उन्होंने उस मस्जिद के नाम से विवाद छेड़ा जिसे भुलाकर मुसलमान आज के मुद्दों पर बात करना चाहते हैं। आज किसान बिल सबसे बड़ा मुद्दा है। पूरा देश आंदोलित है। दो माह से ज्यादा समय से किसान कड़कड़ाती ठंड में सड़कों पर बैठा है। उसमें हर जाति, धर्म का किसान शामिल है। लेकिन उनकी सुनवाई होना तो दूर उन पर हमला करके उन्हें हटाने की कोशिशें हो रही हैं। ऐसे ही जब राकेश टिकैत को हटाने के लिए कुछ लोग गाजीपुर पहुंचे और उनके साथ बहुत ही अभद्र व्यवहार किया तो टिकैत मीडिया के सामने अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख सके और उनके आंसू बह निकले। ये आंसू पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सैलाब बन गए। जो किसान धरना स्थल से लौट गए थे वे वापस आने लगे।

मुज्जफरनगर और मथुरा में बड़ी किसान महा पंचायते हुईं। मुज्जफर नगर की सभा में महेन्द्र सिंह टिकैत के बड़े बेटे नरेश टिकैत के साथ जयंत चौधरी और चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत के साथी रहे गुलाम मोहम्मद जौला भी थे। जौला ने मंच से कहा कि जाटों ने दो बड़ी गलतियां की हैं। एक मुसलमानों को मारा दूसरा अजीत सिंह को चुनाव हरवाया। इसी का परिणाम है कि आज महेन्द्र सिंह टिकैत के लड़के नरेश टिकैत को धमकाया जा रहा है। और वह रो रहे हैं। जौला के 2013 के मुज्जफर नगर दंगे का दुःख व्यक्त करने के बाद नरेश टिकैत ने उन्हें गले लगा लिया और जयंत ने पांव छू लिए। इसके बाद माहौल पूरी तरह बदल गया और जाट और मुस्लिम के साथ आने की बात फिर से होने लगी। सबने आंदोलन को मजबूत करने और फिर वापस समाजिक सद्भाव बनाने की बात कही।

लेकिन कुछ लोग दोस्ती की इस वापसी से परेशान हैं। वे मुसलमानों को बार बार मुज्जफरनगर दंगे की याद दिला रहे हैं। मुसलमानों का बड़ा हिस्सा इन कड़वी यादों को भुलाकर नई शुरुआत करना चाहता है। वह न मस्जिद विवाद में फंसना चाहता है और न ही दंगों के पुराने जख्मों को कुरेदना। यही सकारात्मकता है। लेकिन नकारात्मक और ध्रुविकरण की राजनीति करने वालों को यह सदभाव और भाइचारे की सोच रास नहीं आ रही है। मगर यह जंग हमेशा हुई है।

प्रेम और नफरत में। शांति चाहने वालों और तनाव बढ़ाने की कोशिश में लगे रहने वालों के बीच। इसी को सत्य और असत्य की लड़ाई भी कहते हैं। और अंत में कौन जीतता है यह भी सब को मालूम है!

आपको क्या मिलता हैं ? भड़काऊ नेताओं से सावधान !

किसी बुजुर्ग से सुना था, “भेड़ों की पीठ पर चढ़कर ऊपर वाली एक भेड़ ने आसमान छू लिया, तो इससे नीचे वाली भेड़ों को क्या मिला?”. उस निचली वाली भेड़ जैसा हाल ही हिंदुओं का है.

वर्तमान में मंत्री “अनुराग ठाकुर” के पिता प्रेम कुमार धूमल, हिमांचल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं. वर्तमान में सांसद परवेश वर्मा के पिता “साहिब सिंह वर्मा” दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे हैं. वर्तमान में गृहमंत्री अमित शाह का बेटा “जय शाह” बीसीसीआई का सचिव बना दिया गया है. I repeat BCCI. दुनिया का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड. जय शाह की संपत्ति के 16000 गुना बढ़ने की खबर द वायर ने की थी, वो इससे अलग है. यदि वह गलत होती तो द वायर के सम्पादक आज जेल में होते.

आपके बच्चों को भड़काने वाले तीनों नेताओं के बेटे सेट हैं, ऐसे ही तीनों के बाप सेट थे. इनके बच्चे मोंटेशरी स्कूलों में पढ़ते हैं, जवानी विदेशों में काटते हैं. वापस इंडिया आकर चुनाव लड़तें हैं, इनके गले में माला पड़ती है, तिलक लगता है, आप भीड़ में नीचे जमीन पर बैठकर सिर्फ मूंह तकते हैं, छाती फुलाते हैं. आपका नेता मंच पर चढ़कर आपसे कहता हैं- “गोली मारो सालों को” और आप गोली चला देते हैं, लेकिन इससे आपको क्या मिला? किसी गरीब आदमी के बेटे को ही मार दिया सिर्फ इतना ही न! पुलिस आएगी, पकड़ ले जाएगी, न अनुराग आएगा, न अमित शाह आएगा. अमित शाह का गार्ड ही आपको लात मारकर भगा देगा. पूरी जिन्दगी कोर्ट-कचहरी. शंभु रैगर, गरीब मजदूर ही तो था, आज जेल में सड़ रहा है. एक मजदूर को मारकर उसे क्या मिल गया? हां उसके नेता को वोट जरूर मिला.

आपने कभी सोचा है? आपका नेता आपसे ही गोली चलाने के लिए कहता है, अपने बेटे से क्यों नहीं कहता है? उसे तो वह स्विमिंग पूल में घुमाएंगे, पिज़्ज़ा खिलाएंगे, अंग्रेजी वाले स्कूल में पढ़ाएंगे. एटीएम से पैसा भरके रखेंगे. लेकिन आपके बच्चों से कहेगा “गोली मारो सालों को”. ऐसे ही आप राममंदिर में लगा दिए गए थे, आपने कारसेवा की. आप जैसे एक हजार से अधिक लोग एक अपने घरों पर कभी भी वापस न आ सके. घटना स्थल पर ही मर गए. किसी एक नेता ने उनके परिवारों की कभी कोई सुध न ली.

आप मुझे किसी एक नेता के बेटे का नाम गिना दो, जिसने बाबरी मस्जिद का एक पत्थर भी उखाड़ा हो? एक नेता का नाम गिना दो जो आपके साथ हथौड़ा चला रहा हो, पुलिस से लाठियां खा रहा हो.
आप जमीन पर बैठकर अपने नेता को सुन रहे थे, आपका बेटा पुलिस पर पिट रहे थे, आप पुलिस की लाठी खा रहे थे, आपका नेता मंच से आपको आदेश दे रहा था, “मस्जिद तोड़ दो”
आपको क्या मिला? लेकिन आपके नेता को संसद मिल गई. आपके नेता को राजभवन मिल गया. आपका नेता कल्याण सिंह आज राज्यपाल है, राजस्थान के राजभवन में रहता है, उसका बेटा राजवीर सिंह आज सांसद है, सांसद भवन में रहता है, दिल्ली के सबसे पॉश इलाके में उसे सरकारी आवास मिला हुआ है. उसी समय रथ यात्रा निकालने वाला एक नेता, आज इस देश का प्रधानमंत्री बना हुआ है, 7 आर सी आर पर उसका शानदार भवन है, पीएम आवास में रहता है. उसी समय जमीन समतल करने की बात कहने वाले अटल बिहारी बाजपेयी बाद में प्रधानमंत्री बने, मस्त जिंदगी जिए.

आपको क्या मिला? आपके बेटे को क्या मिला? क्या आपके बच्चे के लिए आपके नेता ने आपके गांव के सरकारी स्कूल को दुरस्त करा दिया है? क्या आपके नेता ने, आपके इलाज के लिए जिला अस्पताल में सारी सुविधाएं करवा दी हैं? क्या दिल्ली के एम्स अस्पताल में आपको अब लाइन में नहीं लगना पड़ता? क्या आपके गांव की सड़क उधड़ी हुई नहीं रही? क्या आपके खाने की दाल अब 40 रुपए किलो मिलने लगी है? क्या आपके बच्चे जिस किसी एग्जाम की तैयारी करते हैं उनके एग्जाम बिना किसी घपले के हो जा रहे हैं? उनमें आजतक कितनी वेकैंसियां निकली हैं? क्या आज सड़क पर पुलिस वाला आपसे रिश्वत नहीं लेता? यदि लेता है तो आप कैसा नेता चुन रहे हैं? नफरत, नफरत, नफरत, सिर्फ नफरत से आपके बच्चों को क्या मिलेगा?

आपको पता ही नहीं है आप निचली वाली भेड़ हैं, जिनपर चढ़कर आपका नेता मौज मार रहा है. आपको लग रहा है मुसलमान को मजा चखाया जा रहा है. लेकिन किस क़ीमत पर ये आपको मालूम ही नहीं है।

– श्याम मीरा सिंह की फेसबुक वॉल से साभार

स्वधर्म के साथ आगें बढ़ें और समाज के लिए बड़े लक्ष्य हासिल करें – संपादक, डॉ अजय प्रकाश सरोज

प्रयागराज: नया साल है ! वैसे तो यह हर बारह महीने के बाद आ जाता है । दिसम्बर की ठंठ जनवरी में ज्यों का त्यों बना रहता हैं । रात भर में कुछ भी नही बदल जाता । हर साल बस तारीख बदल जाती है इसके अलावा कुछ भी तो नहीं बदलता गरीबी ,भुखमरी बीमारी बस वैसे ही है । इस तरह क्रांतिकारी बात लिख देने मात्र से भी कुछ नही बदलेगा । लिखने को तो ढेरों साहित्यिक, दार्शनिक और निर्गुण बातें लिखी जा सकती है लेकिन उसमें स्वयतः सुखाय के अलावा कुछ हासिल नही होने वाला ।

लक्ष्य बिहीन लेखन और सामाजिक समस्याओं के निराकरण बिना लेखन मुझें बहुत आकर्षित नही करता । इसलिए मैं वहीं लिखने की कोशिश करता हूँ जिससे थोड़े ही सही मगर बदलाव की उम्मीद हो लेकिन पासी समाज के लिए तो बदलाव की बात बेईमानी ही लगती हैं । यह समाज थोपे गए विचार या उधार के विचार से संचालित होता हैं । इसका अपना वैचारिक राह नही है ।

पासी समाज में थोड़े बहुत लोगों के पद पैसा में बदलाव हो सकता है ,लेकिन इसके साथ अपनों के लिए उनका ब्यवहार भी बदला जाता हैं । वें पास आने के बजाय समाज से दूर हो जाते हैं । क्या यहीं है बदलाव ! तो मैं इसे बदलाव नही अलगाव की श्रेणी में रखना चाहूँगा ।

बदलाव जब तक परिवर्तनगामी न हो , परिवर्तन अपने साथ बड़े समूह के होने का बोध कराता हैं । समाज के बलबूते स्वधर्म के साथ आगे बढ़ना बड़े लक्ष्य को हासिल करता है । बडे लक्ष्य के लिए समाज में वैचारिक प्रतिमान औऱ स्वधर्म अपनाना होगा । स्वधर्म वहीं जो समाज के बड़े हितों पर केंद्रित हो ब्यक्तिगत लाभ के लिए तो समाज के चाटुकारों की कमी न रही है, न आगे होगी ।

नए साल में उधार के वैचारिकी को छोड़कर समाज के चारित्रिक सौंदर्यबोध के साथ स्वधर्म का पालन करते हुए बड़े लक्ष्य तय करने की समझ समाज में पैदा हो । छोटे मोटे स्वार्थों को त्यागकर बड़े लक्ष्य की ओर समाज अग्रसर हो ऐसी उम्मीद करता हूँ ।

आप सबसे नए वर्ष में नई ऊर्जा के साथ समाज में बदलाव के लिए निरंतर संघर्ष की ज्योति जलाए रखनें के लिए योगदान की अपेक्षा करता हूँ ।

जय संविधान… जय पासी समाज

स्वधर्म के साथ आगें बढ़ें और समाज के लिए बड़े लक्ष्य हासिल करें – संपादक, डॉ अजय प्रकाश सरोज

प्रयागराज: नया साल है ! वैसे तो यह हर बारह महीने के बाद आ जाता है । दिसम्बर की ठंठ जनवरी में ज्यों का त्यों बना रहता हैं । रात भर में कुछ भी नही बदल जाता । हर साल बस तारीख बदल जाती है इसके अलावा कुछ भी तो नहीं बदलता गरीबी ,भुखमरी बीमारी बस वैसे ही है । इस तरह क्रांतिकारी बात लिख देने मात्र से भी कुछ नही बदलेगा । लिखने को तो ढेरों साहित्यिक, दार्शनिक और निर्गुण बातें लिखी जा सकती है लेकिन उसमें स्वयतः सुखाय के अलावा कुछ हासिल नही होने वाला ।

लक्ष्य बिहीन लेखन और सामाजिक समस्याओं के निराकरण बिना लेखन मुझें बहुत आकर्षित नही करता । इसलिए मैं वहीं लिखने की कोशिश करता हूँ जिससे थोड़े ही सही मगर बदलाव की उम्मीद हो लेकिन पासी समाज के लिए तो बदलाव की बात बेईमानी ही लगती हैं । यह समाज थोपे गए विचार या उधार के विचार से संचालित होता हैं । इसका अपना वैचारिक राह नही है ।

पासी समाज में थोड़े बहुत लोगों के पद पैसा में बदलाव हो सकता है ,लेकिन इसके साथ अपनों के लिए उनका ब्यवहार भी बदला जाता हैं । वें पास आने के बजाय समाज से दूर हो जाते हैं । क्या यहीं है बदलाव ! तो मैं इसे बदलाव नही अलगाव की श्रेणी में रखना चाहूँगा ।

बदलाव जब तक परिवर्तनगामी न हो , परिवर्तन अपने साथ बड़े समूह के होने का बोध कराता हैं । समाज के बलबूते स्वधर्म के साथ आगे बढ़ना बड़े लक्ष्य को हासिल करता है । बडे लक्ष्य के लिए समाज में वैचारिक प्रतिमान औऱ स्वधर्म अपनाना होगा । स्वधर्म वहीं जो समाज के बड़े हितों पर केंद्रित हो ब्यक्तिगत लाभ के लिए तो समाज के चाटुकारों की कमी न रही है, न आगे होगी ।

नए साल में उधार के वैचारिकी को छोड़कर समाज के चारित्रिक सौंदर्यबोध के साथ स्वधर्म का पालन करते हुए बड़े लक्ष्य तय करने की समझ समाज में पैदा हो । छोटे मोटे स्वार्थों को त्यागकर बड़े लक्ष्य की ओर समाज अग्रसर हो ऐसी उम्मीद करता हूँ ।

आप सबसे नए वर्ष में नई ऊर्जा के साथ समाज में बदलाव के लिए निरंतर संघर्ष की ज्योति जलाए रखनें के लिए योगदान की अपेक्षा करता हूँ ।

जय संविधान… जय पासी समाज

धर्मवीर राजनीतिक सुचिता व सामाजिक सेवा के प्रकाश पुंज प्रतीक थे।

प्रयागराज: धर्मवीर समाजिक संस्थान के पदाधिकारियों व सदस्यों एवं विभिन राजनीतिक दलों के नेताओं ने आज 22/12/2020 को प्रयागराज में प्रदेश के भूतपूर्व गृहमंत्री व केंद्रीय श्रम मंत्री स्व० धर्मवीर जी की 36वी० पुण्यतिथि पर वैदिक रीति से हवन पूजन के पश्चात् ट्रांसपोर्ट नगर चौराहे स्थित उनकी मूर्ति पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

इस अवसर पर पूर्व सांसद शैलेंद्र कुमार ने उनके दिखाए हुए मार्ग पर चल कर समतामूलक समाज के निर्माण का संकल्प लिया और उन्हें सेवा संघर्ष एवं शालीन राजनीति का प्रतीक बताया। सपा नेता ऋचा सिंह ने उन्हें याद करते हुए कहा की स्व० धर्मवीर जी ने इलाहाबाद कौशंभी के द्वाबा से निकल कर प्रदेश व देश में राजनीतिक पटल पर नाम रोशन किया।

पूर्व विधायक सत्यवीर मुन्ना ने कहा कि धर्मवीर जी स्वतंत्रत्रा आंदोलन की विरासत में पैदा हुए प्रखर देशभक्त थे। वे बड़े विद्वान तथा प्रबुद्ध विचारक थे। समाजिक विषमता की पीड़ा को उन्होंने अपने जीवन काल से ही झेला था। इस कारण वे जो भी काम करते थे, उसका चिंतन राष्ट्र की स्वतंत्रता के साथ साथ युगों से चली आ रही सामाजिक विषमताओं को दूर करने के संकल्प के रूप में रहता था। वरिष्ठ सपा नेता इसरार अहमद ने कहा कि धर्मवीर जी का देश के दबे कुचले मज़लूम लोगों के उत्थान के लिए योगदान सराहनीय रहा। वारिठ नेता मोईनउद्दिन ने कहा की उनके बताए आदर्शो व रास्ते पर चल कर समाज में समानता लाने के साथ-साथ राष्ट्र को तरक्की की ओर ले जाया जा सकता है। भाजपा नेता रामभजन त्रिपाठी ने कहा की उन्होंने सर्वसमज व आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के हकों के लिए आजीवन संघर्ष किया और प्रत्येक मंत्रालय में उनके द्वारा समाज के सभी वर्गों के हित में किए गए कार्य आज भी याद किए जाते हैं। श्रीसत्ता पासी पत्रिका के संपादक अजय सरोज ने कहा कि धर्मवीर जी के आदर्शो को अपनाकर ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सकती है।

पुण्यतिथि श्रधांजलि माल्यार्पण सभा में धर्मवीर समाजिक संस्थान द्वारा सैकड़ों ग़रीबों व ज़रूरतमंदों को शीतलहरी से बचाव हेतु कंबल वितरण व माल्यार्पण किया गया जिसमें कांग्रेस भाजपा सपा जनसत्ता दल बसपा के सम्मानित नेताओं में मुख्य रूप से सुलेम सरांय मेला कमेटी अध्यक्ष दिनेश केसरवानी सुलेम सराय व्यापार मंडल अध्यक्ष अतुल केसरवानी पूर्व चेयरमैन भरवारी टाउन एरिया कैलाश केसरवानी इसरार अहमद मोईनउद्दिन चाचा बबलू यादव प्रधान बुद्धू लाल नेता जी प्रधान हटवा शिबली आनंद आर्य दिनेश आर्य ठाकुर रंजन सिंह नीलू चौरसिया विधि मौर्य अतुल मल्होत्रा आर्य समाज के प्रधान अजीत आर्य रामसुरेमन आर्य बद्रीप्रसाद पूर्व पार्षद महेंद्र सिंह बीएल सरोज गुलाब कोरी शाश्वत आर्य भैयाराम पासी सूर्यवीर चंदन पासी बोधराज पटेल लियाकत अली पंडित कमल शर्मा जनसत्ता दल अखिलेश गुप्ता डॉक्टर पंकज पांडे उदयवीर सिंह बांकेबिहारी तिवारी अभिषेक सिंह निसार अहमद रवि दुबे अमित पांडे कृष्णराज सिंह राणा रवि जी लेखक धर्मेंद्र कुमार पांडे मनीष पांडे विपिन पाल रावत अभिषेक सिंह संगम लाल निजी सचिव मनोज कुमार अफसर अहमद दिलीप सोनी रामखेलावन संगम लाल पांडे कमलेश सिंह सिंगरौर छात्र नेता सुनील सरोज राजकुमार राम संतोष कनौजिया एडवोकेट नमस्ते जी खेड़ा अंकुर केसरवानी अन्नू साहू दिलीप आर्य बहल चाचा आत्मप्रकाश बद्री प्रशाद रंजीत उर्फ़ धाकड़ पासी देवेन्द्र आर्य आदि ने माल्यार्पण कर धर्मवीर जी को श्रधांजलि अर्पित किया।

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जन समस्याओं के हल थें बाबू राम लाल राही

सीतापुर इतना उदास,बेचैन,दुखी और हताश कभी न था ,पिछले 50बरसो में इस जिले की तमाम बड़ी बड़ी सखशियत दुनिया से विदा हुई लेकिन ये शहर इतना निराश कभी न हुआ ,आज तो ऐसा लगता है जैसे इस शहर की धड़कन ही थम गई हो ,हर इंसान एक दूसरे को सिर्फ कातर निगाहों से निहार ही नहीं रहा बल्कि एक अजीब सी बेचैनी उसके मन में है कि अब क्या होगा ,,
बाबूजी रामलाल राही का जाना जिले के किसी सियासी या सामाजिक व्यक्ति का जाना मात्र नहीं है बल्कि जिले के लाखो लोगो की उम्मीदों और आशाओं का टूट जाना है,सियासत की चहारदीवारी तो टूट ही गई है ,हर जाति ,धर्म और आयु के लोगो को लगता है जैसे उसका अभिभावक ,उसके परिवार का कोई सदस्य उनसे विदा हो गया ,वे अपने आप में एक विश्विद्यालय थे ,किसी संदर्भ ग्रंथ की तरह जिले के हर इंसान की समस्याओं का हल थे बाबूजी ।


आज इस बात की बहुत चर्चा होती है कि अमुक व्यक्ति एक सामान्य स्तर से उठकर कैसे शिखर तक पहुंचा ,इसका प्रचार कर लोग भावनाओ को उधेलित करने का प्रयास करते है लेकिन एक अति निर्धन दलित परिवार में जन्म लेकर देश के गृह मंत्री बनने से लेकर उनकी जीवन गाथा किसी सपने के सच होने जैसा है,अल्प शिक्षित होने के बावजूद उनका संसदीय परम्पराओं का ज्ञान ,किसी भी विषय पर उनका गहन अध्ययन किसी को भी प्रेरणा दे सकता है,


उनके जीवन के कितने ही ऐसे संस्मरण है जो इस निराश और हताश सीतापुर के लिए एक ज्योतिपुंज का काम कर सकते है ,लेकिन आज मै कुछ भी कहने और लिखने की स्तिथि में नहीं हूं ,मै जब 2012में बिसवां से सीतापुर रहने आया तो मेरे पास सबसे बड़ी ताकत थी कि मुझे बाबू जी का संरक्षण था ,अभी बाबू जी की पार्थिव देह के पास भाई विनीत दीक्षित बताने लगे कि उन्होंने कुछ समय पहले अम्मा के जाने पर मेरी लिखी एक पोस्ट का जब बाबूजी से जिक्र किया तो बाबू जी ने कहा था कि आराध्य मेरे बेटे जैसा है ,आज सच मे मैंने एक बार फिर अपने पिता को खो दिया और संयोग देखिए मेरे पिता भी फेफड़ों के संक्रमण के रहते इस दुनिया से गए थे और आज बाबू जी भी ।


पिछले दिनों मैंने हाथरस कांड पर 2अक्टूबर को जब उपवास रखा कांग्रेस के कई नेता चाहते थे कि वो मेरा उपवास तुड़वाए लेकिन मै इसे राजनीति से अलग रखना चाहता था तो मै उनकी बताई जगह नहीं जा रहा था तभी बाबूजी का नंबर मोबाइल पर फ़्लैश हुआ और वो बोले भैया आ रहे हो न ,मैंने कहा आप वही है बोले मै अब निकल रहा हूं ,तब मै भी नहीं गया ,मुझे हमेशा अफसोस रहेगा कि उस दिन मै वहा नहीं पहुंच सका ,
बाबूजी के बारे आज भले कुछ न लिख पा रहा हूं लेकिन कल से बाबूजी के जन्मदिन 1जनवरी तक नियमित रूप से उन पर आधारित एक फेसबुक सीरीज आप मेरी वाल पर पढ़िएगा ,*याद सीतापुर के अजातशत्रु की *
मेरे पिता जी बताया करते थे कि गांधी जी के निधन के बाद सीतापुर के जेल रोड के सैकड़ों लोगो ने उनके एका दशा में अपने केश मुंडवाए थे ,पूरा सीतापुर शायद 30जनवरी 1948यानि करीब 72 साल बाद आज फिर उतना ही दुखी है ,विचार शून्य इस जिले की अंधेरी कोठरी में एक रोशनदान थे हमारे बाबूजी


निशब्द हूं ,आज पहली बार मेरे पास लिखने के लिए शब्द नहीं है ,मेरे कई पत्रकार मित्र अपने पत्र के लिए आज बाबूजी से जुड़ा कोई आलेख चाहते थे लेकिन उनसे क्षमा चाहता हूं ,मै सिवा आंसू के आज उन्हें कुछ नहीं दे सकता ,– अज्ञात

इतिहास के आईने में : जननायक राम विलास पासवान

मोहतरम रामविलास जी, आप नहीं रहे!
आपसे जुडी कई बातें याद आयेंगी। आप मेरे गृह विधानसभा क्षेत्र, एवं गृह जिला खगडिया से आते थे। 1995 की वह सभा आँखों के सामने तैर रही है जब आप लालू जी के आने से कई घंटे पहले आकर कार्यकर्ताओं और वहाँ उपस्थित जनसैलाब का उत्साहवर्धन कर रहे थे। लालू जी के मंच पर आते ही नारा गूँजने लगा:

एक कटोरी तीन ग्लास
लालू, शरद, रामविलास।

गूँजे धरती आसमान
रामविलास पासवान।

आपने कहा था, “बिहार के लोग ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ़ सबसे बुलंद आवाज़ लालू जी को दोबारा मुख्यमंत्री चुनने जा रहे हैं। फरकिया के लोग लालू जी को बार-बार अपने आँगन में बुलाते रहेंगे”।

1969 में आप हमारे विधानसभा क्षेत्र अलौली से कांग्रेसी विधायक मिश्री सदा को हराकर पहली बार संसोपा (संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी) के टिकट पर चुनाव जीतकर बिहार विधानसभा पहुंचे थे। उसी दरम्यान आपका चयन डीएसपी पद के लिए भी हो गया था। आपके पिताजी जामुन दास जी चाहते थे कि बेटा जेलभेजवा पार्टी से जुड़े रहने की बजाय रसूखदार और रोबदार पुलिस पदाधिकारी के रूप में समाज का नाम रोशन करे। पर आपके एक कार्यकर्ता साथी लक्ष्मीनारायण आर्य जी ने आपसे कहा, “यह आपके ऊपर है कि गवर्नमेंट बनना चाहते हैं कि सर्वेंट”। और, इस तरह आप किंकर्त्तव्यविमूढ़ता की स्थिति से बाहर आ गए। आपके पिताजी और माताजी कबीरपंथी थे, और सात्विक विचार रखते थे। वे आपको बडे गर्व से देखते थे, और उनकी आँखों में हम बच्चे आजाद भारत में समतामूलक समाज का जिंदा दस्तावेज़ देखते थे। आप दरभंगा जिले के कुशेश्वरस्थान के खगा हजारी जी के नाती थे, और आपका मातृपक्ष बहुत सशक्त था।

बहरहाल, 1972 में आप विधायक का चुनाव हार गये। कोढा (कटिहार) से उपचुनाव लडे, वहाँ भी हार गये। उसके बाद 77 में हाजीपुर से लोकसभा का चुनाव लडे, जिसमें जनता पार्टी की ओर से किसी और को उम्मीदवार (शायद रामसुंदर दास) बना कर भेज दिया गया। तब जेपी ने एक बयान जारी किया, “मुझे नहीं मालूम कि जनता पार्टी का उम्मीदवार कौन है, मगर हाजीपुर में जेपी का उम्मीदवार रामविलास पासवान है”। और वह चुनाव साढे चार लाख वोट से जीत कर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया आपने, जिसे खुद ही 1989 में तोडा। भागलपुर में लोकदल के एक सम्मेलन में देश भर से आये नेताओं के बीच अपने संबोधन में कर्पूरी जी ने आपको “भारतीय राजनीति का उदीयमान नक्षत्र” कहा था। आप दोनों आपातकाल के दौरान नेपाल में भूमिगत थे। ये और बात है कि बाद के वर्षों में कर्पूरी जी के चित्त से आप और रामजीवन सिंह बुरी तरह उतर गये, और कर्पूरी जी ने आप दोनों को अपनी किताब “कितना सच, कितना झूठ” में जम कर कोसा।

अगस्त 1982 की लोकसभा में मंडल कमीशन पर हुई बहस में आपके शानदार हस्तक्षेप ने इंदिरा जी की सरकार को पानी-पानी कर दिया था। बहस पर टाल-मटोल हो रहा था। आप सोमनाथ चटर्जी के घर गये थे, और उनसे कहा था, “कल अगर मंडल कमीशन की रपट पर बहस नहीं होगी, तो सदन में वो सीन क्रिएट होगा जो आज तक नहीं हुआ”। आपका वह कालजयी भाषण आज भी गाँव में अपने स्टडी रूम में एक फाइल में बडी हिफाज़त से रखा है मैंने।

थोडा और अतीत में लौटते हैं। एक बार नये-नये सांसद बने संजय गाँधी ने संसद में आपको चिढाते हुए कुछ कहा। आप खडे हो गये, और ललकारा, “ए संजय गाँधी, हम 1969 में विधायक बने, दूसरी बार लोकसभा में आये हैं। बहुत जुनियर हैं आप। मुझसे कुछ कहना होगा, तो आपकी माँ कहेंगी। तय कर लो कहाँ फरियाना है, चाँदनी चौक कि कनॉट प्लेस, हम तैयार हैं। जनतंत्र में ये रंगबाजी नहीं चलेगी”। इंदिरा जी ने बीच-बचाव किया, “पासवान जी, आप इतने सीनियर मेम्बर हैं। संजय को छोटा भाई समझिए। उसे संसदीय परम्परा अभी सीखनी है। क्षमा बडेन को चाहिए, छोटन को उत्पात”। और, बाद में इंदिरा जी ने आप दोनों को मिलवा दिया। कांग्रेस के सदस्यों के हंगामे के बीच आपने कहा था, “मैं बेलछी में नहीं, भारत की संसद में बोल रहा हूँ”। आपने 80 के दशक के पूर्वाद्ध में दलित सेना का गठन किया था, और उनकी गोलबंदी के काम में लगे थे।

1984 में इंदिरा जी के निधन के बाद आपके घर पर पथराव हुआ, कर्पूरी जी भी आपके ही घर पर ठहरे थे। आप दोनों ने किसी तरह जान बचाई शायद चौधरी साहब के घर जाकर। बहरहाल, चौधरी चरण सिंह जी ने बिजनौर के उपचुनाव में आपको बिहार से यूपी बुला लिया। मीरा कुमार जी और मायावती जी भी उम्मीदवार थीं। आप मीरा कुमार जी से तकरीबन 5 हजार मतों से कडे मुकाबले में हार गये।

लोकदल में जिला महासचिव व जनता दल में जिला उपाध्यक्ष रहे मेरे पिताजी हलधर प्रसाद एक वाकया सुनाते हैं कि चौधरी चरण सिंह जी से मिलने दिल्ली स्थित उनके आवास पर कर्पूरी ठाकुर जी पहुंचे। देखा कि आप वहाँ पहले से बैठे हुए हैं। जिस आदमी ने स्कूटर से कर्पूरी जी को वहाँ पहुँचाया था, उसे तीस रुपये देने थे। उस वक़्त कर्पूरी जी के पास पैसे नहीं थे। उन्होंने आपसे कहा कि इसको तीस रुपये दे दीजिए। मगर अफ़सोस कि आपके पास भी पैसे नहीं थे। तो आपने अपने साथ बैठे अवधेश जी की ओर देखा। फिर अवधेश जी ने जेब से निकाल कर पैसे दिये। तो ऐसे फक्कड़ थे तब के हमारे समाजवादी नेता। आज अफ़सोस कि

“The world is weary of statesmen whom democracy has degraded into politicians.”
(Benjamin Disraeli in Sybil)

1989 में बनी नेशनल फ्रंट सरकार में मंडल कमीशन की रिपोर्ट जिस मंत्रालय के पास थी, उसकी लेटलतीफी देखते हुए सरकार के मुखिया वीपी सिंह जी ने रपट को देख-परख कर उस पर त्वरित निर्णय का जिम्मा आपके मंत्रालय पर डाल दिया, और बडे मनोयोगपूर्वक उस काम को आपने सेक्रेटरी पीएस कृष्णन जी की मदद से समय से पहले पूरा करके प्रधानमंत्री को दे दिया। उस वक्त आपका श्रम, रोज़गार व कल्याण मंत्रालय आज के 6 छोटे-छोटे मंत्रालयों को मिलाकर एक बडे मंत्रालय की शक्ल में था।

मंडल आंदोलन के दौरान यथास्थितिवादी लोग आप पर, लालू जी व शरद जी पर फब्तियाँ कसते थे, “राजा साहब (वीपी सिंह जी) तो ठीक आदमी थे, दुसधा और अहिरा ने मिल कर उनको बिगाड़ दिया”।

बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर को भारत रत्न दिलाने में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के मंत्री के रूप में आपका बडा योगदान रहा। पार्लियामेंट के सेंट्रल हॉल में उनका चित्र लगे, इसमें भी आपकी महती भूमिका रही।

1991 के लोकसभा चुनाव में हाजीपुर में जब आपका बहुत विरोध होने लगा, तो आपने खुद को रोसडा शिफ्ट कर लिया, और वहाँ से जीते। आप कुल 8 बार लोकसभा का चुनाव जीते (7 बार हाजीपुर से, 1 बार रोसडा से)। लोकसभा का कुल 12 चुनाव आपने लडा। हाजीपुर से आप कुल 9 बार लडे जिसमें 7 बार जीते; 1984 व 2009 में हार गये। रोसडा से 1 बार लडे, और जीते। बिजनौर (यूपी) से 1 बार उपचुनाव लडे, और हारे। हरिद्वार (यूपी) से एक बार उपचुनाव लडे, और हारे। आप 2 बार राज्यसभा सांसद रहे।

रामविलास जी, युनाइटेड फ्रंट सरकार में आप लोकसभा में सदन के नेता थे। देवगौडा के कार्यकाल में आपको नेक्स्ट टू प्राइम मिनिस्टर माना जाता था। जब युनाइटेड फ्रंट के नेता को बदला जा रहा था, तो एक रात पहले तक आप चट्टानी ताक़त के साथ देवगौडा जी के लिए वकालत कर रहे थे, मगर जब घटक दलों ने गुजराल जी के नाम पर मुहर लगा दी, तो सुषमा जी ने आपको सदन में घेरा। इस पर आपने प्रत्युत्पन्नमति से कहा, “सुषमा जी, कल को आपका दल अटल जी की जगह आडवाणी जी या मुरली मनोहर जोशी जी को नेता चुन ले, तो क्या आप दल छोड़ देंगी?”

आप जिस भी मंत्रालय में रहे, शानदार काम किया। देवगौडा-गुजराल की युनाइटेड फ्रंट सरकार में हाजीपुर (बिहार) और जबलपुर (मध्यप्रदेश) में जोनल अॉफिस आपकी ही देन है। बाद की एनडीए सरकार में हाजीपुर के जोनल अॉफिस को उठाकर ममता बनर्जी कलकत्ता ले जाना चाहती थीं, जिस पर आप अटल जी के सामने अड़ गये। ममता जी ने बहुत ज़ल्द तुनक कर इस्तीफा दे दिया। आप अक्सर कहते थे, “Where there’s will, there’s railway, where there’s no will, there’s survey.”

जब आप रेलमंत्री थे, तो रेलवे की परीक्षा में आपकी ठकुरसुहाती के लिए रेलवे भर्ती बोर्ड के एक चेयरमैन ने एक प्रश्न सेट कराया कि निम्नांकित उक्ति किनकी है?

“मैं उस घर में दिया जलाने चला हूँ, जिस घर में सदियों से अंधेरा है।”

किसी मसले पर एक बार तत्कालीन राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा से मिलने सौ से अधिक सांसदों का एक बडा दल गया, काफी इंतजार करने के बाद वे सभी लौट आए। तब आपने क़सम खाई थी कि जब तक इस राष्ट्रपति भवन में कोई दलित नहीं बैठ जाता, तब तक आप प्रेजिडेंट हाउस में क़दम नहीं रखेंगे। और, फिर जब जनता दल की अगुवाई वाली युनाइटेड फ्रंट की सरकार 1996 में वाम दल और कांग्रेस के समर्थन से बनी, तो के. आर. नारायणन राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। नारायणन जी ने बिहार में हुए लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार को राष्ट्रीय शर्म बताया था। उपराष्ट्रपति रहते हुए उन्होंने बाबरी मस्जिद के विध्वंस को “महात्मा गांधी की हत्या के बाद देश में हुई सबसे बड़ी त्रासदी” करार दिया था।

रामविलास जी, आपने 1991 में आरएसएस की ज़हरीली फिरकापरस्ती के खिलाफ़ बहुत ज़रूरी व मानीखेज़ तक़रीर की थी, “भिंडरवाला और आडवाणी में क्या अंतर है? भिंडरवाला ने राजनीति शुरू की थी स्वर्णमंदिर से, और आप राजनीति शुरू कर रहे हैं मंदिर से। पूरा का पूरा लग रहा है कि जैसे पार्लियामेंट को ठकुरबाडी बनाया जा रहा है। पार्लियामेंट में संविधान बनेगा, ग़रीब के लिए कानून बनेगा कि घडीघंट डुलाया जायेगा? जितने बाबा लोग हैं, सबको पकड़-फकड़ के लाया जा रहा है वहाँ। तो जब आज पौधा लगाइएगा वो, तो इसका रिज़ल्ट कल क्या होगा? और अब तो मान लेते हैं कि उत्तरप्रदेश में इनकी सरकार बनने वाली है, जाकर के मस्जिद को तोड़ दें!”

बहरहाल, जनता दल में 1997 में हुए विभाजन के बाद 1998 के लोकसभा चुनाव में पूरे बिहार में लालू जी के राष्ट्रीय जनता दल की लालटेन के आगे जनता दल का चक्र छाप बुरी तरह प्रभावहीन हुआ। उस आम चुनाव में जनता दल के टिकट पर पूरे बिहार की 54 सीटों में से जीतने वाले इकलौते उम्मीदवार आप थे, वो भी इसलिए कि समता पार्टी ने आपके खिलाफ़ उम्मीदवार नहीं दिया था। और, यहीं से दल को चलाने व जिंदा रखने के नाम पर आपके और शरद जी के एनडीए में जाने का किस्सा शुरू होता है। वैसे, सबसे पहले दक्षिणपंथी धडे में जॉर्ज फर्णांडिस गये, फिर मान्यवर कांशीराम जी, तब नीतीश कुमार जी, उनके बाद रामकृष्ण हेगड़े जी, फिर आप और शरद यादव जी साथ-साथ।

1998 की 13 महीने की वाजपेयी जी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार चली नहीं। खुद लाल कृष्ण आडवाणी जी आपके घर पर आये, और सरकार को बचा लेने के लिए आग्रह किया, मनचाहा मंत्रालय अॉफर किया, मगर आप टस से मस नहीं हुए, 1 वोट से सरकार गिरा दी। लेकिन 1999 के चुनाव में शरद जी की अगुवाई वाले आपके जनता दल ने एनडीए में जाना स्वीकार किया, जिससे रुष्ट होकर एचडी देवगौडा जी ने अपना अलग दल जनता दल (सेक्युलर) बना लिया।

एक दल के टुकड़े हज़ार हुए
कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा।

लम्बी दास्तां है, क्या कहूँ क्या छोडूँ…

6 प्रधानमंत्री – वीपी सिंह, एचडी देवगौडा, आइ.के. गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ. मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी की 7 सरकारों में आपने क्रमश: श्रम, कल्याण व रोज़गार, रेल व संसदीय कार्य, दूर संचार, रसायन, उर्वयक व इस्पात, और खाद्य व उपभोक्ता मामले का मंत्रालय संभाला।

जब 1999 में आप दूर संचार मंत्री बने, तो गाँव-गाँव में टेलिफोन का जाल आपने बिछा दिया, और भागलपुर की एक सभा में आपने कहा, “जो सेलफोन अम्बानियों के हाथों का खिलौना था, उसे हमने मंगरू काका के हाथ में थमा दिया। हमने कहा था कि एक दिन यह मोबाइल बैगन नहीं रमतोरई (भिंडी) के भाव में बिकेगा, और आज वही हो रहा है”। एक बार एक डोम समाज के व्यक्ति ने रास्ते में आपकी गाडी रोकी, और आपको अपनी व्यथा सुनाई कि कोई उसे पानी भरने नहीं देता। आपने उसके घर में टेलिफोन लगवाया, चापाकल गड़वाया, और ऐसा हुआ कि गाँव भर के सभी जाति के लोगों के रिश्तेदारों के यहाँ से फोन उन्हीं के यहाँ आता था, और लोग उनके घर आकर अपने सगा-संबंधी से बात करते थे। आपकी लोकप्रियता देख कर प्रमोद महाजन ने वाजपेयी का कान भर कर संचार मंत्रालय खुद ले लिया, और आपको कोयला व खान मंत्रालय थमा दिया गया।

2002 में गुजरात में जब दंगे भड़के, तो आपने विरोध में सरकार से इस्तीफा दे दिया। बाद के दिनों में भारत से जब एक शिष्टमंडल पाकिस्तान गया, तो जनरल मुशर्रफ़ से आपने कहा, “मैं वही रामविलास पासवान हूँ जिसने गुजरात दंगे के विरोध में वाजपेयी मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दिया”। पर, इसे विडंबना ही कहेंगे कि आप उसी नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार में दो बार मंत्री बने।

बहरहाल, जब आप यूपीए सरकार – 1 में रसायन मंत्री थे, तो जीवनरक्षक दवाओं की अपच कीमतों को घटाने का फैसला आपने लिया। जिस कैंसर के टैबलेट की कीमत 300-400 थी, उसे आपने 19-20 से 34-35 रुपये करना चाहा, मगर कमलनाथ जी ने अडंगा लगा कर ऐसा होने नहीं दिया।

रामविलास जी, आप किसी बात को गाँठ बाँध कर नहीं रखते थे। जब सब जगह प्रचार खत्म कर लेते थे, तो आप अलौली आते थे, और बहुत भावनात्मक ढंग से कहते थे,
“हाथी चले गाँवे-गाँव
जेकरे हाथी ओकरे नाँव”।

और, फिर पशुपति पारस जी से खफा सारे लोग गिले-शिकवे भुला डालते थे। लालू जी हमारे इलाके में आपके बुलावे पर 90, 91, 95, 96, 2004, 2009 और 2010 में आये। 2014 में भी चिराग़ एनडीए के पक्ष में थे, आप पासवान जी नहीं। लेकिन, धीरे-धीरे पुत्र की राय पर आप मुहर लगाते गये, और एक दिन पार्टी की बागडोर उन्हें सौंपकर आप निश्चिंतता के भाव को जीने लगे।

खगडिया, सहरसा, दरभंगा व समस्तीपुर – इन चार जिलों को जोड़ने के लिए आपने फुलतोडा में बडे पुल का निर्माण कराया। यही वह जगह है जहाँ बहुत-सी जानें एक नाव दुर्घटना में असमय काल-कवलित हो गई थीं।

2005 में जब आपके दल को बिहार विधानसभा में 29 सीटें हासिल हुई थीं, तो टीएनबी कॉलेज, भागलपुर के फिजिक्स के प्रोफेसर प्रसन्न शंकर मिश्र जी ने क्लास में मजाक में मुझसे कहा था, “खगडिया से हो, रामविलास पासवान के इलाके से? फिर तो तुमसे डरके रहना पडेगा। रंजीत डॉन तक को उनकी पार्टी से टिकट मिलता है। बडे-बडे बाहुबली जीत कर आये हैं।” मैंने कहा कि सर उनकी पार्टी से मेरा वास्ता नहीं है।

उस बार सत्ता की चाभी लम्बे समय तक आपने अपने पास रखी। और, जब तक आपने राबडी जी को समर्थन देने का मन बनाया, तब तक देर हो चुकी थी। आपकी पार्टी की प्रदेश इकाई को पॉकेट में लेकर चलने वाले नरेंद्र सिंह को भनक लग गई, और उन्होंने सारे छाँट को अपने साथ ले जाकर गाय-भैंस की तरह नीतीश जी की मंडी में बिकवा दिया। बकौल नीतीश कुमार, “बंगला भूतबंगला में तब्दील हो गया”। आज वही 2005 का भूत नीतीश जी की नींद हराम किये हुए है। पर, अफ़सोस कि आज आप नहीं हैं।

रामविलास जी, कभी-कभी लगता है कि ये “नैतिकता”, “शुचिता”, “शर्मो-हया”, आदि-इत्यादि को बिहार की चुनावी राजनीति के शब्दकोश से निकाल देना चाहिए। इस क्रीडांगन में बहुतों ने बहुतों को किसी-न-किसी मोड़ पर छला है। जीतना किसी पार्टी के टिकट पर, चले जाना किसी और के दर पर… खेल के सारे तयशुदा नियम ध्वस्त होते रहे हैं, रामविलास जी।

जब आप यूपीए में थे, तो एचडी देवगौडा जी के बेटे एचडी कुमारास्वामी ने पिता की इच्छा के विरुद्ध भाजपा के साथ मिल कर सरकार बना ली। देवगौडा जी दिल्ली आये थे सोनिया जी से मिलने, उधर बंगलोर में पुत्र द्वारा खेल हो चुका था। तब आपने मर्मसपर्शी बयान दिया था, “लोग बहुत ज़ल्दी में हैं। मुझे अपने भाई पारस जी पर फख्र होता है जिनके पास उपमुख्यमंत्री बनने का विकल्प था। पार्टी का कामकाज वही देखते हैं। मगर उनका मन ज़रा नहीं डोला। उन्होंने हमेशा मेरी इच्छा का सम्मान किया है”।

याद आ रहा है, लालू जी से गठबंधन होने पर मैंने आपके साथ दो बार मंच साझा किया था। भाई-भाई में प्रेम व परस्पर सम्मान कैसा हो, उसकी एक आदर्श मिसाल आप रहे। आप “न्याय चक्र” पत्रिका के आजीवन प्रधान सम्पादक रहे, इस बात की मैं बारहा तारीफ करता रहा हूँ। जब 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजे के दिन एबी वर्द्धन जी ने आप पर अपमानजनक टिप्पणी की, तो मैंने प्रतिकार किया था। जब आप पर मेरे दल के एक सांसद ने 2018 में अनपेक्षित अनावश्यक प्रतिक्रिया दी, तो मैंने कहा कि उन्हें ऐसा नहीं बोलना चाहिए। तमाम खूबियों और खामियों के साथ आप दिल के साफ़ व्यक्ति थे। इसीलिए, 2014 के चुनाव के ठीक पूर्व लालू जी ने कहा था, “रामविलास जी भले और भोले आदमी हैं। उन्हें मिसलीड किया गया”। बहुत कुछ कहने को है, पर कई भाव उमड़-घुमड़ रहे।

अक्सर अपनी सभाओं में आप डॉ. लोहिया द्वारा संसोपा में दिया नारा दुहराते रहते थे:

संसोपा ने बांधी गाँठ, पिछड़ा पावे सौ में साठ,
राजपाट है किसके हाथ, अंग्रेज़ों और ऊँची जात।
ऊँची जात की क्या पहचान, गिटपिट बोले करे ना काम,
छोटी जात की क्या पहचान, करे काम और सहे अपमान।

अंग्रेज़ यहाँ से चले गए अंग्रेज़ी को भी जाना है,
अंग्रेज़ी में काम ना होगा फिर से देश ग़ुलाम ना होगा।

राष्ट्रपति का बेटा हो या चपरासी की हो संतान
बिड़ला या ग़रीब का बेटा सबकी शिक्षा एक समान।
करखनिया दामों की क़ीमत आने ख़र्च से ड्योढ़ा हो,
अन्न के दाम की घटती-बढ़ती आने सेर के भीतर हो।

जो ज़मीन को जोते है
वो ज़मीन का मालिक है,
ज़ुल्म करो मत ज़ुल्म सहो मत,
जीना है तो मरना सीखो
क़दम-क़दम पर लड़ना सीखो।

आज इसके सरलार्थ के बजाय भावार्थ को समझे जाने और उस पर अमल किये जाने की ज़रूरत है।

लोग एकाध साल में धैर्य खो बैठते हैं। मगर रामविलास जी, 30 वर्षों तक अनवरत आपने सिर्फ़ सोशल जस्टिस की राजनीति की। मुझे 1969 से लेकर 17 अप्रैल 1999 तक वाले रामविलास जी बहुत अजीज़ रहे, और मुझे इस बात का संतोष है कि मुर्दागिरी के इस देश में यह बात मैं आपके जीते जी भी दुहराता रहा। आपके एनडीए में जाने के बाद कभी 12, जनपथ की ओर रुख नहीं किया। पर, इंसान चला जाता है, और गिले भी उन्हीं के साथ समाप्त हो जाते हैं। इस बात का मलाल रहेगा कि रेलमंत्री रहते जिस खगडिया-अलौली, अलौली-सलौना व अलौली-कुशेश्वर स्थान रेल लाइन का शिलान्यास आपने 1997 में किया था, उसका उद्घाटन आप जीते जी नहीं देख सके। उस शिलान्यास सभा में मैं मौजूद था जिसमें माँ के निधन हो जाने के चलते तत्कालीन प्रधानमंत्री देवगौडा जी नहीं आ सके थे। आप कुछ दिन और जीते, तो अपनी जन्मस्थली पर रेल को दौड़ता देख बहुत पुलकित होते! इस बार घर आया, तो तेज़ गति से चल रहे निर्माण-कार्य को देखने कई रोज़ गया, और बरबस आपको याद किया। गुजिश्ता बरस आपके सबसे छोटे भाई रामचंद्र जी गुज़र गये, उसके बाद आप आप नहीं रह गये थे। अंदर-अंदर कुछ दरक रहा था। और अब इतनी ज़ल्दी आपका जाना…

कहते हैं, “आदमी जन्म लेता है, माँ की गोद से लुढ़क कर चलना सीखता है, फिसलते-फिसलते जवान हो जाता है, सँभलते-सँभलते बूढा, और फिर तो लुढ़क कर अलविदा!” 52 साल की सक्रिय सुदीर्घ सियासी पारी आपने खेली। बहुत कुछ कहने को है। फिर कभी…

मौत उसकी है करे जिसका ज़माना अफ़सोस
यूँ तो दुनिया में सभी आये हैं मरने के लिए।

अलविदा, रामविलास जी!
जयन्त जिज्ञासु(लेखक जेएनयू के शोधछात्र है और पासवान जी के लोकसभा क्षेत्र के निवासी हैं)
08.10.2020