कहीं जाति के उलझन में तो फंसा नही हॉकी के जादूगर का भारतरत्न ●अजय प्रकाश सरोज

हॉकी जादूगर मेजर ध्यानचंद जी की जाति चुराने की कोशिश लगातार हो रहीं हैं। यह सच हैं कि दद्दा का जन्मस्थान इलाहाबाद में हुआ था लेकिन जल्द ही उनका परिवार झाँसी में शिफ्ट हो गया ।

जिसकी वजह से उनकी जाति का कोई प्रमाणित साक्ष्य नही मिल सका। जबकि कुशवाहा और पासी साहित्यकारों नें उन्हें अपने साथ जोडने के लिए कुछ तथ्य पेश किए लेकिन यह प्रमाणित नही हैं।

पासी साहित्यकारों का कहना हैं कि इलाहाबाद से झाँसी जाकर बसने से वालें बहुत सें परिवार अपने नाम के आगे जाति की टाइटिल हटाकर’ सिंह ‘लिखने लगें और राजपूत बनकर शादी विवाह तक कर लिए उन्होंने कई उदाहरण प्रस्तुत भी किये हैं.

इसी प्रकार कुशवाहा जाति के बुद्धिजीवियों नें मध्यप्रदेश की सागर जिलें में महेश सिंह कुशवाहा के साथ ब्याही ध्यानचंद जी बहन के आधार पर उन्हें कुशवाहा भी बताया जाता हैं. झाँसी के स्थानीय साहित्यकारों ने बताया कि ध्यानचंद जी के परिवार की कुछ शादियां राजपूत परिवारों में भी हुई हैं.

आज 29 अगस्त उनके जन्मदिवस पर भाषा बैज्ञानिक कहलाने वालें डॉ पृथ्वीनाथ पांडेय ने हिंदुस्तान के प्रयागराज संस्करण पर उनकी जाति को राजपूत होने का दावा किया। लेकिन क्या पांडेय जी कोई प्रमाण दे सकेंगे ? कि मेजर ध्यानचंद जी का परिवार इलाहाबाद के किस मोहल्ले किस गाँव मे रहता था .उनके पट्टीदार लोग कौन हैं और कहाँ हैं ?

हालाकि ! ध्यानचंद जी ने जीते जी कभी अपनी जाति नही बताई ? हो सकता हैं भारतीय समाज में होने वालें भेदभाव की समझ की वजह से उन्होंने ऐसा किया हो ? जो भारतरत्न देनें के लिए आज भी उनके साथ हो रहा हैं.

भारत में जब अंग्रेजी हुकूमत थीं और क्रिकेट का अंग्रेजी खेल भारतीयों के लिए नया था तब भारत हॉकी में तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक अपने नाम कर चुका था. वर्ष 1928, 1932 और 1936 इस ओलंपिक जीत में मेजर ध्यानचंद भारत के वो तुरूप के इक्के साबित हुए थे जिसका तोड़ दुनियां के किसी भी विपक्षी टीम के पास नहीं था.

उस दौर में क्रिकेट की दुनियां में जो शीर्ष स्थान सर डॉन ब्रेडमैन का रहा, वही स्थान ध्यानचंद का था. ब्रेडमैन भी उनके खेल की प्रशंसा किए बग़ैर नहीं रह सके थे. यहां तक कि जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर ने जब ध्यानचंद को खेलते देखा तो वे उनके ऐसे मुरीद हुए कि अपने देश से खेलने का ही न्योता दे दिया. उनके बनाए कई रिकॉर्ड आज तक टूटे नहीं हैं. यह ध्यानचंद के खेल का ही जादू था कि उनकी हॉकी स्टिक की जांच तक की नौबत आ गई थी. कहीं उनकी स्टिक में कोई चुम्बकीय धातु तो तों नही हैं ?

क्योंकि मेज़र ध्यानचंद भारत में अंग्रेजी हुकूमत रहतें यह करिश्मा दिखाया था जिससे अंग्रेजों का सम्मान दुनियां में और बढ़ा था तो उन्होंने वर्ष 2015 में ब्रिटिश संसद में मेजर ध्यानचंद को ‘भारत गौरव सम्मान’ से नवाज़ा गया .आज भी दुनियां उनके फन का लोहा मान रही है, लेकिन उन्हें अपने ही देश में उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है.

वर्ष 2013 में जब क्रिकेट के भगवान कहे जानें वालें सचिन तेंदुलकर को भारतरत्न लिए संसद में खेल को जोड़ा जा रहा था उसके पहलें ही तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नाम पत्र लिखने वाले व्यक्ति झांसी से कांग्रेस सांसद और केंद्रीय राज्यमंत्री प्रदीप जैन थे. इस पत्र में उन्होंने लिखा कि सरकार को हॉकी के जादूगर कहलाए जाने वाले मेजर ध्यानचंद के खेलों में योगदान को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए.

उन्होंने लिखा, ‘ध्यानचंद भले ही 34 साल पहले गुज़र चुके हों, लेकिन उनकी उपलब्धियां ज़िंदा हैं. वे हमारे राष्ट्रीय खेल हॉकी का पर्याय हैं. वे तत्काल भारत रत्न पाने के हक़दार हैं ‘ इस मांग के समर्थन पत्र पर 81 अन्य सांसदों ने भी हस्ताक्षर किए थे जिनमें शशि थरूर, मोहम्मद अज़हरुद्दीन, सीपी जोशी, राज बब्बर, संजय निरूपम, मीनाक्षी नटराजन जैसे बड़े नाम भी शामिल थे. इसके बाद देश भर में बहस छिड़ गई कि पहले भारत रत्न किसे दिया जाए? हॉकी के जादूगर और क्रिकेट के भगवान आमने-सामने थे.
लेकिन सफ़लता सचिन तेंदुलकर को मिलीं और आज भी हॉकी का जादूगर ध्यानचंद भारतीय सरकारों की उपेक्षा का शिकार हैं।

वजह क्या हैं ? भाजपा की सरकार में रेवड़ी की तरह बातें जा रहें भारतरत्न में कहीं ध्यानचंद की जाति तो नहीं ? जो अभी तक स्पष्ट नही हैं . क्या भाजपा ध्यानचंद जी को भारतरत्न देकर कांग्रेसियों को कोसने का अवसर नही हथियाना चाहिए ? वहज कुछ भी हो लेकिन हॉकी जादूगर मेजर ध्यानचंद जी को भारतरत्न देकर राष्ट्रीय खेल हॉकी को सम्मान देकर लाखों हॉकी खिलाड़ियों को प्रोत्साहित किया जा सकता हैं। जो देश के लिए खेलने का सपना लिए स्टेडियम में पसीना बहा रहें हैं।
(लेखक : पत्रिका के संपादक हैं )

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