पिछले दरवाज़े से सेंधमारी – मृणाल पाण्डे


ज्ञानी कह गए हैं कि लोकतंत्र का मतलब है सतत चौकसी। इस चौकसी में लगता है कुछ कमी रह गई है। राज्य चुनावों से फारिग होकर जब मीडिया और विपक्ष उत्तर प्रदेश में पकड़-धकड़ योगी आदित्यनाथ की दिनचर्या और सपा, बसपा और कांग्रेस नेतृत्व के तयशुदा विघटन पर अनवरत चर्चा में व्यस्त थे उस बीच केंद्र सरकार ने वित्त मंत्री के भाषण पर चर्चा के बाद कई विवादास्पद प्रावधानों वाले एक धन विधेयक को लोकसभा में बहुमत का पूरा लाभ उठाकर तुरत-फुरत पारित करा लिया। इस तरह बिना राज्यसभा को भेजे और व्यापक बहस के बगैर ही देश के जन-जन का जीवन प्रभावित करने वाले कई विवादास्पद प्रस्ताव बाध्यकारी कानून बना दिए गए। चतुर सुजान वित्तमंत्री ने कानूनी दलील दी थी कि धारा 388 के तहत इन विषयों का वित्तीय आयाम भी है। इसलिए प्रस्तावित संशोधन धन विधेयक के अंतर्गत लोकसभा में ही पारित हो सकते हैं। उसे राज्यसभा के विचारार्थ भेजना जरूरी नहीं है जहां विपक्ष का बहुमत है। इस जटिल विधेयक के मसौदे में पेश 150 नए प्रावधानों में जिस तरह बिना किसी पूर्वसूचना के अचानक 33 नए, किंतु महत्वपूर्ण प्रावधानों को जोड़ा गया वह तृणमूल कांग्रेस सांसद सौगत राय के अनुसार लोकसभा ही नहीं, बल्कि संसदीय इतिहास में भी अभूतपूर्व है। सांसदों को जटिल एवं तकनीकी, किंतु व्यापक बुनियादी बदलावों वाले इस प्रस्ताव को गौर से पढ़ने-समझने का वक्त ही नहीं मिला और किसी सार्थक बहस या स्पष्टीकरण के बिना ही विधेयक पारित हो गया। संख्याबल कमजोर होने से विपक्ष का प्रतिरोध भी नक्कारखाने की तूती ही साबित हुआ।
बीजू जनता दल के सांसद तथागत सत्पथी के सहायक मेघनाद ने ट्वीट के जरिये बताया कि शायद एक सोची समझी रणनीति के तहत केंद्रीय बजट पर पहले सभी को बोलने का अवसर दिया गया और इससे पहले कि सांसद कुछ समझ पाते, इस धन विधेयक का मसौदा पटल पर रख दिया गया जिसमें अंतर्विरोधों की भरमार थी। मसलन आधार कार्ड को बच्चे, बूढ़े और जवान सभी के लिए अनिवार्य बनाना। भाजपा जब विपक्ष में थी तब 2010 में उसके वरिष्ठ सांसद यशवंत सिन्हा के नेतृत्व वाली संसदीय समिति ने संप्रग की इसी ‘आधार कार्ड योजना’ के प्रस्ताव को खारिज करते हुए इसे एक अस्पष्ट दिशाहीन और जबरदस्ती भरा कदम करार दिया था। उन्होंने यह भी कहा था कि इससे नागरिकों की निजता के अधिकार का भी हनन होगा। खुद मोदी जी ने भी अप्रैल 2014 में इसे एक तिकड़म करार दिया था। अब उसी आधार को क्यों कर इतना बाध्यकारी बनाया जा रहा है कि इसके बिना जनता न तो आयकर भर सकेगी न ही प्राइमरी कक्षा के बच्चे मिड डे मील हासिल कर सकेंगे? यहां तक कि उच्चतम न्यायालय ने भी यह कह दिया है कि जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए आधार की अनिवार्यता जरूरी नहीं है। लोकतंत्र में ताली दोनों हाथों से ही बजती है। लिहाजा जनता या विपक्ष के लिए राजनीतिक फतवे या जुमले ठोस प्रामाणिकता पर आधारित जानकारी के विकल्प नहीं बन सकते। सरकारी गोपनीयता के नीचे दबाई गई जानकारियां पाने को ही सूचना का अधिकार कानून लंबी जद्दोजहद के बाद हासिल किया गया। दूसरी ओर यह भी एक विडंबना ही है कि जो सरकार नागरिकों के निजी जीवन में ‘आधार कार्ड सूचनाओं के मार्फत हर तरह की गहरी ताकझांक का हक चाहती है वह खुद एक जायज सूचनाधिकार कानून के तहत जनता को नोटबंदी जैसे अपने बड़े फैसले के पीछे तथ्यों की बाबत कोई भी वांछित जानकारी देने से बिदक रही है।
संविधान के अंतर्गत बने मौजूदा निगरानी प्रकोष्ठों के पुनर्गठन का प्रस्ताव भी चिंताजनक है। धारा 32 के अनुसार कानूनन ये प्रकोष्ठ आयकर विभाग की किसी निरंकुशता के खिलाफ जनता की सुनवाई करते हैं और उनमें बदलाव तभी लाए जा सकते हैं जब देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के समक्ष कोई बड़ा खतरा मंडरा रहा हो। कम से कम फिलहाल तो ऐसे कोई सूरतेहाल नहीं दिखते। तब अचानक उनके पुनर्गठन और नए प्रकोष्ठ में पहले की तरह विधायिका की सलाह लिए बिना विशुद्ध सरकारी फैसले से नई नियुक्तियां करवाने की क्षमता की पेशकश समझ से परे है। चिंता तब और गहराती है जब जानकार बताते हैं कि सरकारी आयकर विभाग के अधिकारियों द्वारा छापेमारी और घर में बिना पूर्व सूचना के पड़ताल संबंधी अधिकारों का दायरा बहुत अधिक बढ़ा दिया गया है। कहीं वही कहावत तो चरितार्थ नहीं होगी कि ‘जबरा मारेगा भी और रोने भी नहीं देगा।’
अब प्रस्तावित संशोधनों से नागरिक निजता में संभावित सेंध की बात। संविधान के अनुसार निजता यानी खुद अपने और अपनों के जीवन, खान-पान, आजीविका या जीवन मूल्यों ही नहीं, बल्कि राजनीतिक राय के बारे में भी अहम फैसले करने, उन पर खुद सोचने-विचारने, दूसरे लोगों से अंतरंगता साझा करने का हक अभिव्यक्ति की आजादी की ही तरह लोकतांत्रिकता की बुनियाद है।

चंद साल पहले मोदी जी ने ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ का नारा देकर हमें आश्वस्त भी किया था कि उनकी सरकार का जनजीवन में हस्तक्षेप कम से कम और अधिकतम ध्यान बेहतर प्रशासन पर रहेगा। तब सरकार में नागरिक निजता में कभी आधार कार्ड के ब्योरे जमा कर तो कभी बैंक खाते पैन से जोड़कर और कभी पार्क या सड़कों से जब जी किया किसी युवक-युवती को एंटी रोमियो दस्तों से उठवा कर या मीट की दुकान पर बीफ-बीफ चिल्लाकर छापा मारने का ऐसा अभद्र उतावलापन क्यों देखने को मिल रहा है? शंका का दूसरा बड़ा क्षेत्र निजी उपक्रमों द्वारा राजनीतिक दलों को चंदा देने से जुड़ा है। नोटबंदी के दौरान हुई तकलीफ की कचोट कम करने को बीते दिनों नागरिकों को बार-बार बताया गया कि अब सारे दलों का चुनावी काला धन तो मिट्टी बन गया है और शेष कालाबाजारियों का पैसा भी बैंकों में आने को मजबूर हो जाएगा। इससे चुनाव साफ-सुथरे होंगे और गरीबों, खासकर सूखे की मार झेल रहे किसानों को राहत, कर्जमाफी और सीधे बैंक खातों में मदद राशि भेजी जा सकेगी। कालाधन कितना निकला, इस बारे में अभी तक कोई पुख्ता जानकारी नहीं मिल पाई है। वहीं अब सरकार का कहना है किसानों की कर्जमाफी से बैंकिंग व्यवस्था का दम निकल जाएगा, लिहाजा उसकी रजामंदी के बिना इस पर फैसला संभव नहीं। वहीं सब्सिडी के लिए पैन ही नहीं, बल्कि आधार कार्ड भी अनिवार्य होगा।
जहां आम लोगों की निजता के हाल ये हैं वहीं नए कानून ने चुनावी बांड के अजीब से प्रावधान को हरी झंडी दिखा दी है। इसके जरिये उद्योगपति गुमनाम रहते हुए भी अपने पसंदीदा दल को मनचाही राशि के आयकर मुक्त बांड खरीदकर ‘डोनेट’ कर सकते हैं। इन गुप्त दानकर्ताओं का नाम बताने की कोई बाध्यता दलों की भी नहीं होगी। अब कंपनियां बिना नाम बताए आयकर खातों में दर्ज मुनाफे का 50 प्रतिशत तक सरकार को दानखाते में दे सकती हैं। बताया गया है कि इसका उपयोग बुनियादी ढांचा सुधार में होगा। अचरज नहीं कि जो अनुभवी लोग ठेकों के आदान-प्रदान में सरकार तथा निर्माता कंपनियों की मधुर साझेदारी के अनगिनत प्रमाण गुजरे बरसों में देखते रहे हैं उनको लगे कि साफ चुनावों की भैंस तो गई पानी में! अभी बजट सत्र चालू है और सांसदों को वित्त विधेयक के स्वीकृत संशोधनों की अंतिम जानकारी मिलना बाकी है। ऐसे में हम कितनी उम्मीद करें कि वाकचातुर्य की धनी सरकार इन सवालों के सही-सही जवाब जनता और उसके प्रतिनिधियों को कब देगी?
[ लेखिका प्रसार भारती की पूर्व चेयरमैन एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं

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